कौन थे कर्पूरी ठाकुर, जिन्हें मिलेगा देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान? जानें बस एक क्लिक में


कर्पूरी ठाकुर, फ़ाइल फ़ोटो

कर्पूरी ठाकुर, फ़ाइल फ़ोटो



By Ekagra Gupta Posted on: 24/01/2024

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान यानी भारत रत्न दिया जाएगा। भारत सरकार ने ये फैसला उनकी 100वीं जयंती के एक दिन पहले लिया है। बता दें कि, कर्पूरी ठाकुर की पहचान स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक और राजनीतिज्ञ के रूप में रही है। कर्पूरी ठाकुर बिहार के दूसरे उपमुख्यमंत्री और दो बार के मुख्यमंत्री रहे थे। उनकी इतनी लोकप्रियता थी की उन्हें जन-नायक भी कहा जाता था।

कौन थे कर्पूरी ठाकुर?

कर्पूरी ठाकुर को बिहार की सियासत में सामाजिक न्याय की अलख जगाने वाला नेता माना जाता है। कर्पूरी ठाकुर का जन्म एक साधारण नाई परिवार में हुआ था। कहा तो ये भी जाता है कि, पूरी जिंदगी उन्होंने कांग्रेस विरोधी राजनीति की और अपना एक सियासी मुकाम हासिल किया।

दो बार मुख्यमंत्री बने थे कर्पूरी ठाकुर

कर्पूरी ठाकुर साल 1970 में पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। 22 दिसंबर 1970 को उन्होंने पहली बार राज्य की कमान संभाली। लेकिन उनका पहला कार्यकाल महज 163 दिन का रहा था। साल 1977 की जनता लहर में जब जनता पार्टी को भारी जीत मिली तब भी कर्पूरी ठाकुर दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। लेकिन अपना यह कार्यकाल भी वह पूरा नहीं कर सके। इसके बाद भी महज दो साल से भी कम समय के कार्यकाल में उन्होंने समाज के दबे-पिछड़ों लोगों के हितों के लिए काफी काम किया।

बिहार की सियासत में आया परिवर्तन

उन्होंने बिहार में मैट्रिक तक की पढ़ाई मुफ्त कर दी। वहीं, राज्य के सभी विभागों में हिंदी में काम करना अनिवार्य कर दिया। कर्पूरी ठाकुर ने अपने कार्यकाल में गरीबों, पिछड़ों और अति पिछड़ों के हक में ऐसे अनेकों काम किए, जिससे बिहार की सियासत में काफी परिवर्तन आ गया। वहीं, इसके बाद कर्पूरी ठाकुर  की राजनीतिक ताकत में जबरदस्त इजाफा हुआ और वो बिहार की सियासत में समाजवाद का एक बड़ा चेहरा बन गए।

कर्पूरी ठाकुर के शिष्य हैं लालू-नीतीश!

बिहार में समाजवाद की राजनीति कर रहे लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार कर्पूरी ठाकुर के ही शिष्य माने जाते हैं। जनता पार्टी के दौर में लालू और नीतीश ने कर्पूरी ठाकुर की उंगली पकड़कर सियासत के गुर सीखे थे। ऐसे में जब लालू यादव बिहार की सत्ता में आए तो उन्होंने कर्पूरी ठाकुर के कामों को आगे बढ़ाया। वहीं, नीतीश कुमार ने भी अति पिछड़े समुदाय के हक में काफी कार्य किए।

बिहार की राजनीति में काफी अहम हैं कर्पूरी ठाकुर

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि, कर्पूरी ठाकुर को बिहार की राजनीति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वर्ष 1988 में कर्पूरी ठाकुर का निधन हो गया था, लेकिन इतने साल बाद भी वो बिहार के पिछड़े और अति पिछड़े मतदाताओं के बीच काफी ज्यादा लोकप्रिय हैं। गौरतलब है कि, बिहार में पिछड़ों और अतिपिछड़ों की आबादी करीब 52 फीसदी है। ऐसे में सभी राजनीतिक दल अपनी पकड़ बनाने के उद्देश्य से कर्पूरी ठाकुर का नाम लेते रहते हैं। यही वजह है कि वर्ष 2020 में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में ‘कर्पूरी ठाकुर सुविधा केंद्र’ खोलने तक का ऐलान कर दिया था।