उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सुंदर वादियाँ अब केवल पर्यटन का केंद्र नहीं, बल्कि हर साल प्रकृति के प्रकोप की मार झेलने वाला इलाका बन चुकी हैं। जिस हिमालय को कभी देवभूमि कहा जाता था, वह आज लगातार बदलते मौसम, बादल फटने, भू-स्खलन और बाढ़ जैसी विनाशकारी आपदाओं का शिकार बन रहा है। हाल ही में धराली में आई आपदा से लोग उबरे भी नहीं थे कि थराली में बादल फटने की एक और घटना ने लोगों को झकझोर कर रख दिया। घर तबाह हो गए, सड़कें बह गईं, और कई लोगों की जान पर बन आई।
ये घटनाएं अब दुर्लभ नहीं रह गईं। पहाड़ों में हर मानसून एक डर लेकर आता है — डर किसी पुल के टूटने का, किसी गांव के बह जाने का, या अचानक आए पानी की लहर में सब कुछ तबाह हो जाने का। प्रशासन की तैयारियों के दावे हर साल किए जाते हैं, लेकिन जब आपदा आती है, तो ज़मीनी सच्चाई कुछ और ही होती है। राहत और बचाव के इंतज़ाम अक्सर देर से होते हैं, और कई बार तो सिर्फ कागज़ों में सीमित रह जाते हैं।
थराली की तबाही भी इसी लचर सिस्टम की एक और मिसाल है। लगातार हो रही बारिश और बढ़ते बादल अब केवल मौसम की खबर नहीं हैं, बल्कि जीवन और मौत का कारण बन चुके हैं। हिमालयी क्षेत्र की नाज़ुक पारिस्थितिकी प्रणाली साल दर साल कमजोर होती जा रही है, जिसका सबसे बड़ा कारण है – अनियंत्रित विकास, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन। पहाड़ों को काटकर बनाए गए सड़क मार्ग, नदी किनारे बसे असुरक्षित गांव और बिना योजना के किए गए निर्माण, इन आपदाओं को न्योता देते हैं।
प्रश्न यह है कि कब थमेंगी ये पहाड़ी चीखें? कब प्रशासन समय रहते चेतावनी देगा और तैयारी करेगा? और सबसे अहम, कब पहाड़ों में रहने वाले लोग अपने ही घरों में सुरक्षित महसूस कर पाएंगे?
धराली और थराली की आपदाएं केवल प्राकृतिक घटनाएं नहीं हैं, ये हमारी लापरवाही, हमारी नीति-निर्माण की कमजोरी और हमारी संवेदनहीनता का परिणाम हैं। अब वक़्त आ गया है कि केवल प्रतिक्रिया न हो, बल्कि पूर्व-तैयारी की संस्कृति विकसित की जाए। ताकि अगली बार कोई चीख सुनी जाए, तो वो मदद की पुकार नहीं, बल्कि राहत की सांस हो।
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