बिहार में जारी जातीय सर्वेक्षण रिपोर्ट, जिसे सोशल इकोनॉमिक कास्ट रिपोर्ट यानी SIR के नाम से जाना जा रहा है, एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत के दरवाज़े पर पहुंच चुकी है। इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज एक अहम सुनवाई हो रही है, जिसे सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश की सामाजिक और राजनीतिक दिशा के लिहाज़ से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ — जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची — के समक्ष हो रही है, और यह तय किया जाना है कि क्या यह रिपोर्ट संविधान, कानून और नागरिकों के निजता के अधिकार के दायरे में आती है या नहीं।
याचिकाकर्ताओं ने इस रिपोर्ट को पूरी तरह से अवैध और असंवैधानिक बताते हुए अदालत से मांग की है कि इसे रद्द किया जाए। उनका तर्क है कि जातीय आधार पर लोगों की सामाजिक-आर्थिक जानकारी एकत्र करना निजता के अधिकार का घोर उल्लंघन है और इससे सामाजिक विभाजन और वर्ग संघर्ष को बढ़ावा मिल सकता है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस रिपोर्ट का कोई स्पष्ट कानूनी आधार नहीं है और इसे राज्य सरकार ने केवल राजनीतिक फायदे के लिए तैयार कराया है।
दूसरी ओर, बिहार सरकार ने इस रिपोर्ट का पूरी मजबूती से बचाव किया है। सरकार का कहना है कि जातीय आंकड़े किसी भी विकास नीति और कल्याणकारी योजनाओं की सही दिशा तय करने के लिए अनिवार्य हैं। खासकर समाज के पिछड़े और वंचित वर्गों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए यह डाटा बेहद उपयोगी सिद्ध होगा। सरकार का यह भी कहना है कि सर्वे जनहित में और पूरी पारदर्शिता के साथ कराया गया है, और इसे पूरी कानूनी प्रक्रिया के तहत अंजाम दिया गया।
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं, क्योंकि यह फैसला न सिर्फ बिहार के जातीय सर्वेक्षण पर प्रभाव डालेगा, बल्कि भविष्य में अन्य राज्यों में इस तरह के सर्वेक्षण की संभावनाओं को भी तय करेगा। यह मामला उस गहराई तक जुड़ा है जहां सामाजिक न्याय, संवैधानिक अधिकार और राजनीतिक स्वार्थ एक-दूसरे से टकराते हैं। यदि कोर्ट इस रिपोर्ट को वैध ठहराता है, तो यह सामाजिक-आर्थिक नीतियों में एक नई दिशा देगा। वहीं यदि इसे खारिज किया जाता है, तो यह भारत की जातिगत राजनीति और नीतियों पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।
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