भारत और रूस के बीच ऐतिहासिक संबंधों को एक नई दिशा तब मिली जब विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मॉस्को की यात्रा के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से एक महत्वपूर्ण मुलाकात की। यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक राजनीति में असंतुलन की स्थिति बनी हुई है, और अमेरिका जैसे पश्चिमी देश भारत पर रूस से दूरी बनाने का दबाव बना रहे हैं। लेकिन भारत ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि उसकी विदेश नीति स्वतंत्र है और वह अपने आर्थिक, रणनीतिक और राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही कोई भी निर्णय लेता है।
मॉस्को में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में दोनों देशों ने व्यापार, रक्षा सहयोग, ऊर्जा, और कूटनीति जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में साझेदारी को और गहराने पर चर्चा की। भारत ने यह संकेत भी दिया कि वह रूस के साथ दीर्घकालिक रणनीतिक भागीदारी को किसी भी तरह के विदेशी दबाव के आगे कुर्बान नहीं करेगा। एस. जयशंकर ने पुतिन से बातचीत के दौरान स्पष्ट कहा कि भारत स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति में विश्वास रखता है, और दोनों देशों के बीच सहयोग वैश्विक स्थिरता के लिए भी आवश्यक है।
रूस के साथ भारत का रिश्ता केवल रक्षा या व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ऐतिहासिक विश्वास और साझी रणनीतिक सोच पर आधारित है। चाहे वह ब्रिक्स हो, एससीओ या अन्य बहुपक्षीय मंच—भारत और रूस अक्सर एक-दूसरे के हितों का समर्थन करते आए हैं। मॉस्को यात्रा के दौरान दोनों पक्षों ने रुपये-रूबल व्यापार व्यवस्था, ऊर्जा सेक्टर में संयुक्त निवेश, और नई रक्षा परियोजनाओं पर भी गंभीरता से विचार किया।
इस कदम को वैश्विक विश्लेषकों द्वारा भारत की एक मजबूत कूटनीतिक चाल माना जा रहा है, जिसमें वह संतुलन बनाकर चलते हुए अपनी संप्रभुता की रक्षा करता है। अमेरिका के दबाव को खुले तौर पर नकारते हुए भारत का यह रुख यह भी दर्शाता है कि वह अब वैश्विक राजनीति में एक आत्मनिर्भर शक्ति के रूप में उभर चुका है।
यह बैठक भारत-रूस संबंधों को न केवल मजबूती देगी, बल्कि आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय सहयोग को एक नई ऊंचाई तक ले जाने की संभावनाएं भी बढ़ा देगी।
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