अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नया मोड़ तब आया जब अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत को 50% टैरिफ लगाने की चेतावनी दी। इसमें 25% रेसिप्रोकल (प्रतिशोधात्मक) और 25% अतिरिक्त शुल्क शामिल है। इस कदम ने वैश्विक ऊर्जा व्यापार और कूटनीतिक संबंधों में हलचल मचा दी है।
भारत, जो रूस से सस्ती दरों पर कच्चा तेल खरीदता रहा है, ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए इस नीति को जारी रखा है। अमेरिका का मानना है कि यह खरीद रूस की अर्थव्यवस्था को समर्थन देती है, जो यूक्रेन युद्ध के चलते पहले से ही वैश्विक आलोचना झेल रहा है। इसी पृष्ठभूमि में, अमेरिका ने भारत पर कड़ा रुख अपनाते हुए भारी टैरिफ लगाने की धमकी दी है।
लेकिन इस बार भारत अकेला नहीं है। चीन खुलकर भारत के समर्थन में सामने आया है। भारत में चीन के राजदूत जू फेइहोंग ने स्पष्ट कहा कि “धमकियों से डरने की कोई जरूरत नहीं है” और चीन भारत के साथ मजबूती से खड़ा है। यह बयान सिर्फ समर्थन नहीं, बल्कि चीन-भारत आर्थिक रिश्तों की एक नई शुरुआत का संकेत भी हो सकता है।
जू फेइहोंग ने कहा कि किसी भी देश को अपनी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी करने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए और यह किसी तीसरे देश के दबाव में नहीं होना चाहिए। उनका यह रुख अमेरिका को स्पष्ट संदेश देता है कि एशियाई शक्तियाँ अब वैश्विक दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं।
इस घटनाक्रम ने भारत-चीन संबंधों में आर्थिक मोर्चे पर एक नया समीकरण खड़ा कर दिया है। जहाँ एक ओर दोनों देश सीमा विवादों और भू-राजनीतिक तनावों से जूझते रहे हैं, वहीं अब एक साझा मंच पर अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने की संभावनाएँ बनने लगी हैं।
भारत सरकार की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है, लेकिन अंदरखाने में रणनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। क्या भारत अमेरिका की धमकी के आगे झुकेगा, या रूस और चीन के साथ मिलकर एक नया आर्थिक ध्रुव बनाएगा?
इस मुद्दे का असर सिर्फ भारत पर नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा नीति, और शक्ति संतुलन पर भी पड़ेगा। आने वाले दिन निश्चित ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिहाज़ से बेहद निर्णायक साबित होंगे।
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