डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति एक बार फिर से अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा का विषय बनी हुई है। उनके नेतृत्व में अमेरिका एक बार फिर ऐसे कदम उठा रहा है, जिससे पूरी दुनिया की निगाहें पश्चिम एशिया की ओर टिक गई हैं। ताजा घटनाक्रमों से संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए संभावित रूप से एक और सैन्य कार्रवाई की योजना बना रहा है। यह सवाल एक बार फिर जोर पकड़ रहा है कि क्या अमेरिका इस बार ईरान के परमाणु इन्फ्रास्ट्रक्चर को पूरी तरह से खत्म करने में सफल हो पाएगा?
ईरान का परमाणु कार्यक्रम वर्षों से विवाद और तनाव का केंद्र रहा है। हालांकि ईरान ने हमेशा यह दावा किया है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगी देश इसे एक गंभीर खतरे के रूप में देखते रहे हैं। खासकर डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति रहते हुए ईरान के साथ 2015 की परमाणु संधि (JCPOA) को रद्द कर देना और फिर उस पर लगातार प्रतिबंध लगाना, एक आक्रामक विदेश नीति का संकेत था।
अब जब एक बार फिर ट्रंप चुनावी मैदान में हैं और उनकी वापसी की संभावना पर चर्चाएं तेज़ हैं, विशेषज्ञ मानते हैं कि वे अमेरिका की पुरानी विदेश नीति को फिर से आक्रामक दिशा में मोड़ सकते हैं। इस बार अगर ईरान पर सैन्य कार्रवाई होती है, तो यह सिर्फ परमाणु ठिकानों तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि इससे पूरे क्षेत्र में अशांति फैलने का खतरा भी बढ़ सकता है।
प्रश्न यह भी उठता है कि क्या ट्रंप की यह रणनीति सिर्फ एक चुनावी स्टंट है या इसके पीछे वाकई कोई दीर्घकालिक सामरिक सोच छिपी हुई है? क्या अमेरिका इस बार ईरान के परमाणु कार्यक्रम को स्थायी रूप से नष्ट कर पाएगा या यह सिर्फ एक और अस्थायी प्रयास साबित होगा?
ट्रंप की नीतियों में अक्सर आक्रामकता और अप्रत्याशितता देखी गई है। उन्होंने पहले भी उत्तर कोरिया से लेकर अफगानिस्तान तक कई साहसिक फैसले लिए हैं। लेकिन क्या इस बार उनका इरादा वाकई युद्ध की ओर बढ़ने का है या यह केवल दबाव बनाने की रणनीति है, यह आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।
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