उत्तर प्रदेश इस समय बाढ़ और मूसलधार बारिश की दोहरी मार से कराह रहा है। राज्य के कई जिले जलप्रलय जैसे हालात का सामना कर रहे हैं। गंगा, घाघरा, राप्ती और शारदा जैसी नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं, जिससे आसपास के गांव, कस्बे और शहरी इलाके जलमग्न हो गए हैं। खेत-खलिहान डूब गए हैं, सड़कों पर नावें चल रही हैं और जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो चुका है।
इन आपदा जैसे हालातों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रशासन क्या कर रहा है? जवाब है—ज्यादातर जगहों पर कुछ नहीं। राहत कैंप या तो पहुंचे ही नहीं हैं या फिर वहां पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। पीने के पानी से लेकर दवाइयों तक की भारी कमी है। जिन लोगों ने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर रुख किया है, वे भी भूखे-प्यासे और असहाय नजर आ रहे हैं।
हर साल की तरह इस साल भी हालात बिगड़ने के बाद ही हरकत में आया सिस्टम, बाढ़ पूर्व चेतावनी, राहत सामग्री की समय पर आपूर्ति, और लोगों को पहले से सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने जैसी जरूरी तैयारियां इस बार भी कागजों तक सीमित रहीं। अधिकारियों के दौरे हो रहे हैं, बयान दिए जा रहे हैं, लेकिन ज़मीन पर न राहत है, न व्यवस्था।
यह रिपोर्ट सिर्फ बाढ़ की तस्वीरें नहीं दिखाती, बल्कि यह उन ज़रूरी सवालों को भी उठाती है जो इस सिस्टम से पूछे जाने चाहिए। आखिर कब तक जनता हर साल बर्बादी झेलेगी और सरकारें सिर्फ आश्वासन देती रहेंगी? क्यों नहीं बनती कोई स्थायी योजना जो बाढ़ से पहले हालात को संभाल सके? और क्यों हर बार राहत के नाम पर राजनीति और खानापूर्ति ही देखने को मिलती है?
उत्तर प्रदेश की यह स्थिति न सिर्फ प्रशासनिक नाकामी को उजागर करती है, बल्कि उन लाखों लोगों की पीड़ा को भी सामने लाती है जो इस आपदा में फंसे हुए हैं और जिनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही।
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