उत्तर प्रदेश में 16 जुलाई से 23 जुलाई तक सभी स्कूल और कॉलेज बंद रखने का आदेश जारी किया गया है। इसका कारण है — सावन माह में होने वाली कांवड़ यात्रा, जिसमें लाखों की संख्या में शिवभक्त सड़कों पर निकलते हैं। यह परंपरा अब वर्षों से जारी है, और हर साल श्रद्धा की इसी तस्वीर के पीछे शिक्षा व्यवस्था ठप हो जाती है।
प्रशासन का तर्क है कि भारी भीड़, ट्रैफिक व्यवस्था और कानून-व्यवस्था को संभालना प्राथमिकता है। ऐसे में बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्कूल-कॉलेजों को अस्थायी रूप से बंद करना ज़रूरी हो जाता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या भीड़ प्रबंधन की नाकामी का बोझ हर बार छात्रों की पढ़ाई पर ही डाला जाएगा?
हर साल सावन आता है, हर साल यही फैसला दोहराया जाता है। कांवड़ यात्रा की तैयारी कोई आकस्मिक संकट नहीं है, फिर भी शासन-प्रशासन इस वार्षिक यात्रा को मैनेज करने में इतना अक्षम क्यों है कि शिक्षा व्यवस्था को ही रोक देना पड़े?
श्रद्धा, भक्ति और धार्मिक आस्था अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं। पर क्या यह उचित है कि हर वर्ष लाखों विद्यार्थियों की शिक्षा, परीक्षा और शैक्षणिक अनुशासन सिर्फ इसलिए प्रभावित हो, क्योंकि सिस्टम के पास कोई बेहतर योजना नहीं है?
क्या यह समय नहीं है कि भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा और यात्रा मार्ग की व्यवस्थाओं को इस तरह मजबूत किया जाए कि स्कूल और कॉलेज खुले रह सकें, और श्रद्धा तथा शिक्षा दोनों एक साथ चल सकें?
इस वर्ष भी लाखों छात्र 8 दिनों तक पढ़ाई से वंचित रहेंगे। क्या यह छुट्टी उनके लिए वरदान है या एक मजबूरी? इस पर बहस होना ज़रूरी है।
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