उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में मौसम विभाग द्वारा सोमवार को भारी से बहुत भारी बारिश, तेज आंधी और बिजली गिरने की चेतावनी जारी की गई थी। साथ ही, हवाएं 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने की संभावना भी जताई गई थी। इस चेतावनी को देखते हुए देहरादून के जिलाधिकारी ने सभी शासकीय, गैर-शासकीय और निजी स्कूलों में एक दिवसीय अवकाश की घोषणा कर दी।
हालांकि, इस पूर्व चेतावनी के बावजूद राज्य के कुछ क्षेत्रों में प्रशासनिक लापरवाही देखने को मिली। कुछ इलाकों में ना तो समय रहते सार्वजनिक सूचना दी गई और ना ही ट्रैफिक और आपातकालीन सेवाओं के पर्याप्त इंतजाम किए गए। इससे स्कूल जाने वाले बच्चों और अभिभावकों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा।
मौसम विभाग की ओर से पहले ही रेड और ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया था, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि कुछ स्थानों पर जलभराव, भूस्खलन और पेड़ों के गिरने जैसी घटनाएं हो सकती हैं। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर तैयारी अधूरी नजर आई।
राज्य के अन्य हिस्सों में भी स्थानीय प्रशासन को सक्रिय भूमिका निभाने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन सोशल मीडिया पर आई रिपोर्टों और तस्वीरों में कई स्थानों पर प्रशासन की अनुपस्थिति और अव्यवस्था साफ देखी गई।
देहरादून में स्कूलों को बंद करने का निर्णय सराहनीय था, लेकिन इसकी सूचना कई स्थानों पर देरी से पहुंची, जिससे कई छात्र सुबह स्कूल पहुंच चुके थे। कुछ निजी स्कूलों ने छुट्टी की घोषणा तो की, लेकिन पहले से तय समय के बाद।
यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि आपदा पूर्व चेतावनी के बावजूद क्यों नहीं होती पर्याप्त तैयारी? ऐसे में आवश्यकता है कि भविष्य में सभी विभागों के बीच बेहतर समन्वय, सूचना का त्वरित प्रवाह और जनता की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
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