उत्तराखंड और मध्य हिमालय में लगातार बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं ने लोगों की चिंता के साथ-साथ राजनीतिक हलचल भी बढ़ा दी है। पहाड़ों पर भूस्खलन, अचानक आई बाढ़ और बदलते मौसम के खतरे अब केवल पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा भी बनते जा रहे हैं। इस बीच, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने एक बड़ा सवाल उठाया है। उन्होंने कहा है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में सरकारों की जिम्मेदारी सिर्फ राहत और बचाव कार्य तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि ठोस रणनीति और दीर्घकालिक नीतियों की आवश्यकता है।
हरीश रावत ने केंद्र और राज्य सरकारों से अपील की है कि वे मिलकर एक व्यापक योजना तैयार करें ताकि हिमालयी क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। उनका कहना है कि आज समय आ गया है जब केवल बयानों और औपचारिक बैठकों से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर काम किया जाए। रावत ने यह भी कहा कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्र का अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि हर साल आपदा आने के बाद सरकारें केवल घोषणाएं करती हैं लेकिन लंबे समय तक असरदार कदम नजर नहीं आते। वहीं, पर्यावरणविदों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और अव्यवस्थित विकास कार्य मिलकर पहाड़ों की स्थिति को और गंभीर बना रहे हैं।
अब सवाल यह है कि क्या इस मुद्दे पर राजनीति से आगे बढ़कर सभी दल मिलकर कोई ठोस कदम उठाएंगे? या फिर उत्तराखंड की जनता को हर साल नई आपदा का सामना करना पड़ेगा? यह समय तय करेगा कि हिमालय के भविष्य के लिए जिम्मेदार सरकारें कैसी नीतियां बनाती हैं।
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